गुरुवार, जुलाई 14, 2005

फ़िल्म - बाग़बान

बाग़बान की कहानी पति-पत्नी के बारे में शुरु होती है। वे दोनों अपने साथ बहुत खुश लगते हैं और हार दिन वे अपने प्यार मनाते हैं। ४० साल शादी के बाद पति (राज) तय करता है कि वह काम करने खतम करेगा। अकेले लगते हुए राज-पूजा चाहते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ रह सकते हैं। राज उन से यह खबर बताकर उन को फ़ैसल छोर देता है। बच्चे सोचते हैं कि अगर वे राज-पूजा अलग करे तो उस के फैसला मनज़ूर नहीं हो। लेकिन है, और छ: महीने के लिये राज दिल्ली में रहता है और पूजा ममबाय में रहती है। खोजते हुए कि अपने बच्चों के उन को कोई इज़्ज़त नहीं है बहुत ग़म लगते हैं। इस ग़म के बारे में कहानी में राज से लिखा हुअ है। यह किताब, "बाग़बान", बहुत मशहुर बनकर राज-पूजा आमीर लोग बनते हैं। गस्से से राज "जेनैरेशन गाप" के बारे में समझाता है। वह अपने बेटे नहीं माफ़ करेगा।

मेरी राय में यह फिल्म बहुत ज़्यादा सीधी है। फिर मुझे अभिनय अच्छा नहीं लगा। लेकिन मेरा मनपसंद अभिनेता परेश रवल था - बहुत मज़ेदार था।

1 Comments:

Anonymous बेनामी said...

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5:54 अपराह्न  

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